Godavari Tambekar

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पहिली ते दहावी संपूर्ण अभ्यास

पहिली ते दहावी संपूर्ण अभ्यास
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हिंदी निबंध लेबल असलेली पोस्ट दाखवित आहे. सर्व पोस्ट्‍स दर्शवा
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रविवार, ७ जानेवारी, २०२४

जानेवारी ०७, २०२४

आदर्श गाँव

 

                                    आदर्श गांव. 


                        भारत गाँवों में बसता है, इसलिए यदि आदर्श भारत की रचना करनी है, तो सबसे पहले गाँवों को आदर्श बनाना होगा। 

                       आदर्श गाँव वह है, जहाँ लोग व्यसनों से मुक्त हों, मेलजोल से रहते हों। लोग आपसी लड़ाई-झगड़ों, दुश्मनी और मुकदमेबाजी से दूर हों, उनमें एकता और सहयोग की भावना हो। इस प्रकार आपसी प्रेम और भाईचारे की भावना से युक्त गाँव ही आदर्श गाँव कहलाता है। ऐसा आदर्श गाँव छोटा भले ही हो, पर वहाँ स्वर्ग जैसा सुख होगा। 

                        बुरी आदतें आदमी को बरबाद कर डालती हैं। शराब, जुआ, बीड़ी-सिगरेट आदि का सेवन ऐसी ही बुरी आदतें हैं। इन व्यसनों में फँसे लोगों की सारी कमाई नशे में बरबाद हो जाती है। लोगों की गरीबी बढ़ती जाती है। व्यसन के पीछे उनके घर-द्वार तक बिक जाते हैं। जिस गाँव के लोग मेहनती, श्रद्धालु और संतोषी हों; जिनकी दिलचस्पी धन के सदयुयोग में हो, जहाँ के लोग व्यसनों से पूरी तरह मुक्त हों, वही गाँव आदर्श गाँव कहा जा सकता है। 

                     आदर्श गाँव उसे कहते हैं जहाँ के सभी लोग शिक्षित हों। शिक्षित होकर ही वे देश की उन्नति में अपना योगदान कर सकते हैं। शिक्षित लोग ही ज्ञान-विज्ञान का लाभ उठा सकते हैं। शिक्षित किसान ही वैज्ञानिक ढंग से खेती कर सकता है। इसलिए आदर्श गाँव में कम से कम माध्यमिक शिक्षा तक की पढ़ाई की व्यवस्था जरूर होनी चाहिए। लोगों का ज्ञान बढ़ाने के लिए गाँव में एक सार्वजनिक पुस्तकालय तथा वाचनालय होना चाहिए। इलाज की सुविधा के लिए गाँव में कम से कम एक अच्छा दवाखाना होना जरूरी है। गाँववालों को पीने के लिए शुद्ध जल सुलभ होना चाहिए। गाँव में बिजली की समुचित व्यवस्था हो और जानमाल की सुरक्षा के लिए एक पुलिस चौकी भी हो। गाँव से कस्बे तक पक्की सड़क होनी चाहिए। गाँव के अंदरूनी रास्ते भी पक्के होने चाहिए।

                          गाँव के बाहर खेल का एक मैदान तथा गाँव के आसपास हरेभरे बगीचे हो, तो गाँव की शोभा में चार चाँद लग जाते हैं। जो सुख, समृद्ध एवं प्रगतिशील हो, वही आदर्श गाँव है।

गुरुवार, ५ ऑक्टोबर, २०२३

ऑक्टोबर ०५, २०२३

प्रदर्शनी में दो घंटे

 

                प्रदर्शनी में दो घंटे

        प्रदर्शनों में मनोरंजन के साथ-साथ नई-नई वस्तुओं, विविध प्रकार की कलाकृतियों और औद्योगिक प्रगति आदि को जानकारी मिलती है। यह जानकारी प्रदर्शनियों में जाने से दो-चार घंटे में ही एकसाथ मिल जाती है। 

        मेरे शहर में कई दिनों से ‘ भारत– 2020' प्रदर्शनी लगी हुई थी। गत रविवार की शाम को मैं अपने मित्रों के साथ यह प्रदर्शनी देखने गया था। प्रदर्शनी इतनी शानदार थी कि उसकी चहल पहल दूर से ही मालूम होती थी। प्रदर्शनी के भव्य और विशाल प्रवेश द्वार की शोभा बहुत ही आकर्षक थी। दूद्वार को सुंदर चित्रों एवं बिजली के जलने-बुझने वाले विविध रंग के बच्चों से सजाया गया था। भारत माता का चित्र तो बहुत ही शानदार था। प्रदर्शनी के बाहर टिकट के लिए कतारें लगी हुई थी। कुछ देर कतार में खड़े रहने के बाद हमें टिकट मिला और हम प्रदर्शनी देखने अंदर गए।       

       प्रदर्शनी के भीतर देश के विभिन्न प्रांतों के सजे हुए आकर्षक मंडप थे 'महाराष्ट्र दर्शन' में नमूनों, नक्शों और चित्रों दद्वारा महाराष्ट्र के विकास को झाँकी दिखाई गई थी। आदिवासियों से संबंधित कलाकृतियों के प्रति दर्शकों का विशेष आकर्षण था। ' मनोहर गुजरात ' में गुजरात की आधुनिक प्रगति के दृश्य दर्शाए गए थे। 'केरल मंडप' में केरल राज्य की प्राकृतिक शोभा बड़ी आकर्षक लग रही थी। हमने राजस्थान, उत्तर प्रदेश, असम व आंध्र प्रदेश आदि प्रांतों के खूबसूरत मंडप भी देखें। जम्मू कश्मीर के मंडप में पृथ्वी के स्वर्ग' की सुंदर झलक मिलती थी। इस मंडप में कश्मीरी टोपियाँ, ऊनी कंबल व शाल आदि वस्तुएँ बिक रही थीं। मैंने एक सुंदर टोपी और मेरे मित्र ने एक शाल खरीदा। 

       प्रदर्शनी में देश की औद्योगिक प्रगति के बारे में भी बताया गया था। नवीनतम रेल इंजनों के प्रतिरूप, नई कारें, नवीनतम मशीनें, विमानों के नए मॉडल आदि वस्तुएँ देखकर हम बहुत प्रभावित हुए। हमारे देश ने कितना विकास कर लिया है। खेती के कार्यों में इस्तेमाल होने वाले नए-नए औज़ार और विविध मोबाइल फोन भी हमने देखे। यह सब देखकर हमें बहुत खुशी हुई।  

       प्रदर्शनी में मनोरंजन का भी अच्छा प्रबंध था। चरखी, मौत का कुआँ, जादू के खेल मेरी-गो-राउंड तथा सिनेमाघर में बच्चों के साथ बड़ों और बुज़ुगों की भीड़ लगी हुई थी। प्रदर्शनी में खाने-पीने के कुछ स्टाल भी थे। चलते-चलते हम थक गए थे। हमने एक स्टाल पर कुछ नाश्ता किया और घर लौट पड़े।

        इस प्रकार हमने दो घंटे तक प्रदर्शनी में धूम-फिरकर बहुत-सी जानकारी प्राप्त की। विशेषकर देश में हुई प्रगति के संबंध में नई-नई जानकारी प्राप्त कर हमें बहुत खुशी हुई।

ऑक्टोबर ०५, २०२३

भारतीय किसान

                                     भारतीय किसान 



[ रूपरेखा (1) परिचय (2) दैनिक काम-काज (3) जीवन की झलक (4) कुछ दोष भी (5) किसान का महत्त्व] 

       भारत एक कृषिप्रधान देश है इसलिए हमारे देश में किसानों का बहुत महत्व है। किसान को अन्नदाता कहा जाता है। सचमुच, अन्न उगाकर किसान हमारा पेट भरता है। 

       बड़े सबेरे हल बैल लेकर किसान अपने खेत पर चला जाता है। यह पूरे दिन वहाँ खेती के काम में जुटा रहता है। दोपहर का खाना भी वह खेत पर ही खाता है। शाम को वह घर लौटता है। घर आकर वह बैलों को घास, भूसा, खली आदि डालता है। फिर कहीं जाकर उसे आराम मिलता है। पूस माघ की ठंड, वैशाख जेठ की तेज धूप व वर्षा को तेज झड़ियों के बीच भी किमान अपने काम में जुटा रहता है। 

       भारतीय किसान का रहन-सहन सीधा-सादा होता है वह ज्यादातर मिट्टी से बने कच्चे मकान में अपने परिवार के साथ रहता है। हमारे देश में खेती प्राय: वर्षा पर आधारित है। अच्छी वर्षा होने पर किसान सुखी होता है। किंतु वर्षों के अभाव में वह दुःखी हो जाता है। जहाँ नहरों एवं ट्यूबवेल से सिंचाई को सुविधा उपलब्ध है, वहाँ के किसान अधिक सुखी हैं। 

       स्वतंत्रता के बाद हमारे देश के किसानों की दशा में काफी सुधार हुआ है। आज वे भले ही गरीब हो, पर मजबूर नहीं हैं। वे अतिथि का स्वागत दिल खोलकर करते हैं। 

        आजादी के बाद हमारे देश में शिक्षा का काफी प्रसार हुआ है। इस कारण आज का किसान सर्वथा अनपढ़ नहीं रह गया है। उसके बच्चे गाँव की पाठशालाओं में पढ़ाई पूरी कर आगे की शिक्षा भी प्राप्त कर रहे हैं। इन सब के बावजूद आज भी हमारे अनेक किसान अंधविश्वासों में जकड़े हुए हैं। वे जादू-टोने में विश्वास रखते हैं। मृत्युभोज, विवाह आदि अवसरों पर वे अपनी हैसियत से अधिक खर्च कर देते हैं। इसलिए वे प्रायः कर्ज के बोझ तले दबे रहते हैं। इसके अतिरिक्त वे व्यसनों के भी शिकार होते हैं।

     किसान हमारे देश की रीढ़ है। उसकी मेहनत ने देश को आज अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया है। सचमुच किसान ही इस देश का भाग्यविधाता है। देश की प्रगति किसान की प्रगति पर निर्भर है। 

       जय किसान ! जय भारत।

 

ऑक्टोबर ०५, २०२३

मेरा भारत अथवा मेरा भारत महान

 

       मेरा भारत अथवा मेरा भारत महान 


[ रूपरेखा (1) प्रस्तावना (2) अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य (3) महान विभूतियों का जन्मदाता (4) विविधता में एकता (5) हर क्षेत्र में भारी प्रगति (6) भावनात्मक एकता (7) संप्रभुता की रक्षा में समर्थ (8) निष्कर्ष । ] 

       मुझे भारतीय होने पर गर्व है। हम बड़े उत्साह से गाते हैं- 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से अरुणाचल प्रदेश तक इस महान देश का विस्तार है। उत्तर में हिमालय इसका मुकुट है। दक्षिण में हिंद महासागर इसके पाँव पखारता है। मेरे देश का प्राकृतिक सौंदर्य विविधतापूर्ण एवं अद्भुत है। लगभग सर्वत्र हरे-भरे वन तथा फसलों से लहलहाते खेत हैं। 

        मेरा महान भारत ज्ञानियों तथा तपस्वियों का देश है। गौतम बुद्ध, महावीर, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी जैसी महान विभूतियों का जन्म भारत में ही हुआ था। उन्होंने अपने ज्ञान के प्रकाश से सारे संसार को आलोकित कर दिया था। अपने त्यागमय जीवन एवं कर्मठता से समग्र मानवता का उन्होंने मार्गदर्शन किया। भारतीयों की विचारधारा भी समस्त सृष्टि के लिए कल्याणकारी रही है। इस देश ने सारे विश्व को अहिंसा और मैत्री का संदेश दिया है।

     मेरे देश में विभिन्न धर्मों, संप्रदायों, भाषाओं, संस्कृतियों एवं रीति-रिवाजवाले लोग मिल जुलकर रहते हैं। उनमें जो देशभक्ति है, वही हमारी एकता की आधारशिला है। भारत की विविधता में एकता विश्व भर में विख्यात है। इसी भावना के बाल पर भारत की अखंडता बनी हुई है। 

      स्वतंत्रता मिलने के पश्चात भारत ने हर क्षेत्र में भारी प्रगति की है। देश-विभाजन, विदेशो आक्रमण, प्राकृतिक आपदाएँ एवं विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों झेलकर भी हमारे कदम आगे ही आगे बढ़ते गए हैं। भारत आज अनेक क्षेत्रों में आत्मनिर्भर एवं शक्तिशाली बन गया है।

        हमारी भावनात्मक एकता एवं महान विरासत के कारण हमारे देश पर कभी आँच नहीं आई। यह महान देश अपनो अखंडता की रक्षा करने में पूर्ण रूप से समर्थ है। 

      हम भारत के भावी नागरिक हैं। भविष्य में हमें ही भारत का कर्णधार बनना है। हम दृढ़ संकल्प करें कि हम देश के सच्चे सपूत सिद्ध होंगे।

ऑक्टोबर ०५, २०२३

यदि समाचारपत्र न होते.....

              यदि समाचारपत्र न होते....

 [ रूपरेखा (1) प्रस्तावना (2) विभिन्न जानकारियों का अभाव (3) विज्ञापन के सशक्त माध्यम से वंचित (4) सरकारी नीतियों की जानकारी न मिलती (5) कृषि संबंधी नवीनतम जानकारी का अभाव (6) राष्ट्र निर्माण में सहायक समाचारों से वंचित (7) निष्कर्ष 1] 

   भव बआकाशवाणी और दूरदर्शन से जो समाचार हमें प्राप्त होते हैं, वे अपर्याप्त होते हैं। समाचारपत्र हमारे लिए सुबह की चाय को तरह ही जरूरी है। समाचारपत्रों के माध्यम से हम स्वयं को देश और संसार से जुड़ा हुआ पाते हैं। यदि समाचारपत्र न होते तो देश-दुनिया के राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक, सांस्कृतिक और सामरिक समाचारों तथा विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं के बारे में कोई जानकारी न मिलने से हम बेचैन हो जाते। 

       हम अपनी रुचि और विचारधारा के अनुसार अपना मनपसंद समाचारपत्र खरीदते हैं। समाचारपत्रों से हमें कई प्रकार को जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। यदि समाचारपत्र न होते तो हम विविध प्रकार की जानकारियों तथा अन्य पठनीय सामग्रियों से वंचित रह जाते।

       प्रचार और विज्ञापन के इस युग में समाचारपत्रों को विशिष्ट भूमिका है। समाचारपत्र विज्ञापन के सशक्त माध्यम है। फिल्म व्यापार नौकरी, जगह-जमीन विभिन्न उत्पादनों तथा समारोहों की जानकारी हमें समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों से ही मिलती है। व्यापार वृद्धि में समाचारपत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी शक्ति और उनका प्रभाव चारों और व्याप्त है। समाचारपत्रों के महत्व का वर्णन करते हुए उर्दू के कवि अकबर इलाहाबादी ने कहा है 'खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।' यदि समाचारपत्र न होते. तो जनजीवन को प्रभावित करने वाला एक अत्यधिक सशक्त माध्यम हो न रहता। 

        यदि समाचारपत्र न होते, तो जनता को सरकारी नीतियों की जानकारी न मिल पाती। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा व्यापारिक तथा औद्योगिक क्षेत्रों को गतिविधियों की जानकारी से वंचित रह जाता। लोगों को कृषि विकास संबंधी गतिविधियों का भी यथोचित ज्ञान नहीं हो पाता। देश की प्रगति अत्यंत मंद पड़ जाती ।

      भारत के स्वतंत्रता संग्राम में समाचारपत्रों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी आज भी राष्ट्र के पुनर्निर्माण में समाचारपत्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। समाचारपत्र को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यदि समाचारपत्र न होते. तो लोकतंत्र के इस महत्त्वपूर्ण स्तंभ से हम वंचित रह जाते। 

       यदि समाचारपत्र न होते तो हमारे जीवन के विविध क्षेत्रों की गतिविधियों आज जैसी तेज न होतीं। हम यह सोच भी नहीं सकते कि समाचारपत्रों का अस्तित्व न होता तो क्या होता।

ऑक्टोबर ०५, २०२३

यदि परीक्षाएँ न होतीं....

 

              यदि परीक्षाएँ न होतीं.... 



(1) परीक्षाएँ न होने पर आनंद ही आनंद (2) परीक्षाएँ विद्यार्थियों के ज्ञान की सूचक नहीं (4) अभिभावकों तथा परीक्षकों को राहत (4) मार्गदर्शिकाओं, कोचिंग क्लास आदि से छुटकारा (5) परीक्षाओं से बचना असंभव।]

        इकाई परीक्षाओं तथा सत्रांत परीक्षाओं का सिलसिला छात्रों को चैन नहीं लेने देता कितना अच्छा होता, यदि परीक्षाएँ ही न होती सिर पर परीक्षाओं का बोझ न होता, तो बस आनंद ही आनंद रहता। मगर मान लें कि परीक्षाएँ खत्म कर दी जाएँ, तो छात्रों को प्रगति की जानकारी कैसे मिलेगी ? छात्र को अगली कक्षा में तरक्की किस आधार पर दी जाएगी? 

         सालभर की पढ़ाई का मूल्यांकन दो-तीन घंटे में कैसे हो सकता है? परीक्षाओं में सफल होने वाले विद्यार्थियों में भी ज्ञान शायद ही दिखाई देता है। उन्हें मिली सफलता उनके ज्ञान और बुद्धि की नहीं, उनकी रटने की शक्ति की है। आज के विद्यार्थी केवल परीक्षार्थी बन कर रह गए हैं। वे केवल परीक्षा में पास होने भर के लिए ही पढ़ते हैं। कुछ तो बिना पढ़े, नकल कर या किन्हीं अन्य उपायों से सफल हो जाते हैं। इसलिए आधुनिक             परीक्षाओं को ज्ञान का मापदंड नहीं कहा जा सकता। लेकिन छात्र पढ़ाई के द्वारा जो ज्ञान प्राप्त करते हैं उसका पता बिना परीक्षा के कैसे चलेगा? परीक्षाओं को बहुत अधिक महत्त्व दिया जाता है। बच्चों की पढ़ाई के पीछे माँ-बाप की नींद हराम हो जाती है। बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए माँ बाप खुद उन्हें पढ़ाने में लगे रहते हैं। उनके लिए यूशन की व्यवस्था करने में खूब खर्च करते हैं। यदि परीक्षाएँ न होतीं, तो अभिभावकों को बहुत राहत मिलती परीक्षकों को भी उत्तर पुस्तिकाएँ जाँचने में अपनी आँखें न फोड़नी पड़तीं। लेकिन परीक्षाओं की झंझट न होती तो भला कोई पड़ता हो क्यों ?

         इसलिए परीक्षा पद्धति भले ही कुछ हद तक दोषपूर्ण हो, पर विद्यार्थी को अगली कक्षा में ले जाने के लिए उसको क्षमता तो परखनी पड़ेगी ही। इसलिए परीक्षाएँ कभी बंद नहीं हो सकतीं। परीक्षाओं के अभाव में बुद्धिमान विद्यार्थियों को क्षमता का पता कैसे लगेगा? इसलिए परीक्षाएँ आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी हैं।

ऑक्टोबर ०५, २०२३

यदि मैं समाज सेवक बनूँ....

 

        यदि मैं समाज सेवक बनूँ.... 



(1) समाजसेवा देशसेवा का लघु रूप (2) समाज में रूढ़ होने वाली बुराइयों से समाज को मुक्त करना ((3) गरीब बस्तियों में स्कूल, पुस्तकालय, वाचनालय, खुलवाना (4) रोजगारपरक शिक्षा पर विशेष ध्यान (5) सामूहिक विवाह पद्धति को प्रोत्साहन (6) योग्य विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति (7) तन-मन-धन से समाजसेवा।] 

       समाजसेवा एक प्रकार से देश की सेवा ही है। इसमें समाज के कल्याण की योजनाएँ बनती हैं और समाज की प्रगति के लिए प्रयत्न किए जाते हैं। 

      यदि मैं समाजसेवक बनूँ तो सबसे पहले में लोगों को उन बुराइयों से मुक्त करने का प्रयत्न करू जो समाज को खोखला कर रही हैं। इनमें मुख्य है दुर्व्यसन धूम्रपान और शराब तो पहले भी समाज के शत्रु थे अब तरह-तरह के इस हमारे युवकों का जीवन बरबाद कर रहे हैं। मैं इनके खिलाफ जोरदार मुहिम चलाऊँगा और इनसे युवकों को छुटकारा दिलाने के लिए विशेष उपाय करूंगा। 

      प्रगति का मूल शिक्षा है। मैं गरीब बस्तियों में विद्यालयों की स्थापना करूंगा। इन विद्यालयों में शैक्षिक विषयों के अतिरिक्त ऐसे काम भी सिखाए जाएँगे, जो भविष्य में आजीविका के साधन बन सकें। मैं पुस्तकालय और वाचनालय भी खुलवाऊँगा, जहाँ फुरसत के समय लोग विविध जानकारी प्राप्त कर सकें।

        एक जाग्रत समाजसेवक के रूप में मैं सामूहिक विवाह कार्यक्रमों का आयोजन करवाऊँगा। आज समाज का एक तबका ऐसा है जिसके लिए विवाह खर्च उठाना कठिन हो गया है।

       समाज की उभरती हुई प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने के लिए मैं परीक्षाओं में श्रेष्ठ प्रदर्शन करने वालों के लिए पुरस्कार देने का कार्यक्रम रखेंगा। मैं योग्य और निर्धन छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था करूंगा। 

     मैं समय-समय पर रक्तदान और आरोग्य शिबिरों का भी आयोजन करवाऊँ। 

      इस प्रकार में तन-मन-धन से समाज की सेवा कर अपने जीवन को सार्थक बनाऊंगा।

ऑक्टोबर ०५, २०२३

मेरा गाँव

 

                         मेरा गाँव

 रूपरेखा (1) गाँव का परिचय (2) गाँव का वर्णन (3) गाँव के लोग (4) एक आदर्श गाँव (5) गाँव के प्रति प्रेम । ] 

         मेरा गाँव गोदावरी नदी के तट पर बसा हुआ है। मेरे गाँव के चारों ओर रमणीय पहाड़ियाँ हैं। खेतों को हरियाली इसकी शोभा बढ़ाती है। मेरे गाँव का नाम रामपुर है। 

        आज़ादी के बाद मेरे गाँव ने बहुत तरक्की की है। गाँव के दक्षिणी हिस्से में पंचायत-घर है। गाँव के छोटे-मोटे झगड़ों का निपटारा यहीं होता है। पंचायत घर के पास ही गाँव का पुस्तकालय और वाचनालय है। इस वाचनालय में पत्रिकाएँ और अखबार मँगाए जाते हैं। 

        मेरे गाँव में एक बहुत पुराना और प्रसिद्ध राम मंदिर है। इसी मंदिर के कारण मेरे गाँव का नाम रामपुर पड़ा है। सुबह-शाम आरती के समय मंदिर में बहुत भीड़ होती है। रामनवमी के अवसर पर यहाँ एक मेला लगता है। मेरे गाँव की आबादी लगभग दो हजार है। गाँव के ज्यादातर निवासी किसान हैं। उनके अलावा गाँव में लुहार, कुम्हार, बढ़ई, दर्जी, धोबी, नाई आदि भी रहते हैं। गाँव के लोग बहुत सीधे-सादे और मेहनती हैं। वे आज भी पुराने रीति-रिवाजों को मानते हैं। फिर भी उनके विचार प्रगतिशील हैं। उन्होंने खेती के नए तरीके अपना लिए हैं। गाँव में बिजली आ जाने से कई लघु-उद्योग भी शुरू हो गए हैं।

           रामपुर एक आदर्श गाँव है। गाँव में एक प्राथमिक शाला और एक हाईस्कूल है। हाईस्कूल में पढ़ाई के अलावा बागवानी, कताई, बुनाई तथा लघु उद्योगों की शिक्षा भी दी जाती है। गाँव में एक छोटा-सा अस्पताल भी है। वहाँ गाँव के मरीजों का किफायती दरों से इलाज किया जाता है। गाँव में कुछ छोटी-मोटी दुकानें हैं। हर रविवार को यहाँ बड़ा बाजार लगता है। इस बाजार में साग-सब्जी और फलों के अलावा कपड़ा तथा घरेलू उपयोग की अनेक चीजें बिकने के लिए आती हैं। गाँव में पशु-धन भी पर्याप्त है। कुछ सब्जियाँ तथा दूध सहकारी समिति द्वारा शहरों में बिक्री के लिए भेजा जाता है। इससे गाँववालों को अच्छी आमदनी हो जाती है। गाँव में वृक्षारोपण समारोह के समय बहुत नए पेड़ लगाए जाते हैं। करगिल के युद्ध में गाँव के एक जवान की शहादत से मेरे गाँव का गौरव बढ़ गया है। सचमुच, मुझे अपने गाँव पर गर्व है। मैं अपने गाँव के विकास में अपना योगदान देता रहूँगा।

सोमवार, १८ सप्टेंबर, २०२३

सप्टेंबर १८, २०२३

मेरा प्रिय नेता

 

                                     मेरा प्रिय नेता 



[ रूपरेखा : (1) प्रिय नेता का उल्लेख (2) जीवन की झलक (3) देश सेवा के कार्य (4) राष्ट्रपिता उपाधि मिलना (5) उपसंहार ।]

             हमारे देश में एक से बढ़कर एक देशप्रेमी नेता हुए हैं। गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर टिळक, महात्मा सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण जैसे अनेक नेताओं के नाम भारत इतिहास में अमर हैं। इन सभी नेताओं के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान की भावना है। पर इन सब में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी प्रिय नेता है।

                 गांधी जी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के पोरबंदर शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम करमचंद गांधी श्री माता का नाम पुतलीबाई था। भारत में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे इंग्लैंड गए। वहाँ से वे बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। 

                   इसके बाद वे वकालत करने दक्षिण अफ्रीका गए। दक्षिण अफ्रीका में उस समय अंग्रेजों का राज था। अंग्रेज वहाँ भारतीयों पर तरह तरह के जुल्म ढाया करते थे। अतः उन भारतीयों के अधिकारों की रक्षा के लिए गांधी जी ने कमर कस ली। उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया। इसमें उन्हें सफलता मिली। इसके बाद वे भारत लौटे। दिनों भारत में भी अंग्रेजों का शासन था। भारत आकर उन्होंने देश की आजादी के लिए असहयोग आंदोलन चलाया। गांधी जी ने जनता के मन में राष्ट्रीयता व स्वतंत्रता की भावना जगाई। उन्होंने अंग्रेजों से लड़ने के लिए लोगों को एकजुट किया। गांधी की पुकार पर आजादी के दीवानों की टोलियों अहिंसक संग्राम में कूद पड़ीं। आखिरकार गांधी जी के नेतृत्व में देश आबाद हुआ। सचमुच, गांधी जी महान नेता थे। 

                       भारत स्वतंत्र होने पर गांधी जी ने नए समाज की नींव डाली। अंग्रेजों द्वारा शोषण होने से हमारे देश में बहुत गरीबी थी। गांधी जी ने तकली और चरखे दुद्वारा भारतवासियों की रोजी-रोटी की समस्या हल करने का प्रयत्न किया। उन्होंने शराबबंदी ला करने, निरक्षरता मिटाने, स्त्रियों को शिक्षा दिलाने गाँवों का उद्धार करने तथा शुआछूत को समस्या को दूर करने के लिए जी-तोड़ प्रयास किए। देशवासियों के कल्याण व प्रगति के लिए वे जीवन भर प्रयास करते रहे। इन कार्यों के लिए देश की जनता ने भी उनका साथ दिया। 

                     गांधी जी सत्य, अहिंसा और प्रेम के पुजारी थे। वे सही अर्थों में भारत की सामान्य जनता के प्रतिनिधि थे। वे दया और क्षमा की जीवंत मूर्ति थे। उन्होंने नवीन भारत का निर्माण किया। इसलिए देश की जनता ने उन्हें राष्ट्रपिता का सम्मान दिया। गांधी जी युग निर्माता व महान नेता थे, इसीलिए वे मेरे प्रिय नेता हैं।

सप्टेंबर १८, २०२३

एक किसान की आत्मकथा

 

    एक किसान की आत्मकथा 



(रूपरेखा (1) धरती का लाल और दैनिक जीवन की कठिन जीवन (4) सामाजिक जीवन (3) प्रगति के पथ पर 

               मैं एक किसान हूँ। होती मेरा व्यवसाय है। लोग मुझे 'काला' कहते हैं। पहले लोग राजा को 'अन्नदाता' कहते थे। अब स्वतंत्र भारत में यह गौरव हमें दिया जाता है। 

                 मैं गाँव में रहता हूँ। मेरा पर पहले कच्चा था। अब इसका कुछ हिस्सा पक्का बन गया है। इसी घर में मैं अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता हूँ। मैं बहुत सवेरे हल-बैल लेकर अपने खेत पर चला जाता है। पूरे दिन नहीं खाता हूँ। अपने खेतों की जोताई करता हूँ। उनकी बोवाई करता हूँ। जब छोटे छोटे पौधे बड़े हो जाते हैं, तो उनकी सिंचाई और निराई करता है। फिर रात-दिन फसल की देखभाल करता रहता हूँ। फसल पक जाने पर उसकी कटाई करता है। तब कहीं आकर अनाज घर में आता है। मेरी पत्नी और बच्चे भी इन कामों में मेरी मदद करते हैं। अनाज के दाने वास्तव में मेरी मेहनत के मोती हैं। 

                 सावन-भादों को मूसलाधार बरसात में भी मैं खेतों में काम करता हूँ। पूष साथ की ठिठुरती सदी में फटे कपड़े लपेटे में फसलों को सिंचाई करता हूँ। जेठ- वैशाख की तपती लू में फसल की मैड़ाई करता हूँ। इतना करने पर भी कभी-कभी प्रकृति साथ नहीं देती। कभी सूखे के कारण फसल नष्ट हो जाती है और कभी ज्यादा वर्षा और बाढ़ से फसल बरबाद हो जाती है। घर की पूँजी भी मिट्टी में मिल जाती है। फिर भी मैं अपने काम में जुटा रहता हूँ। त्योहार ही हमारे मनोरंजन के साधन हैं। मेरे परिवार में होली, दीवाली, दशहरा, रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, रामनवमी आदि स्योहार उत्साह से मनाए जाते हैं। हम गरीब भले ही हों, पर अतिथियों एवं साधु-संतों का हमेशा स्वागत करते हैं। उनको सेवा सरकार में कोई कसर नहीं आने देते। हमारा रहन-सहन बहुत सादा है। खेती से जो भी मिल जाता है, उसी में हम गुजारा कर लेते हैं। उसी में बच्चों की पढ़ाई लिखाई होती है। उसी में से शादी ब्याह का काम भी निपटा लेते हैं।

              इन दिनों हम किसानों की दशा में काफी सुधार हुआ है। ग्रामीण बैंक से आज हमें कम सूद पर कर्ज मिल जाता है। इससे साहूकारों के चंगुल से हमें छुटकारा मिल गया है। मैं भी बैंक से कर्ज लेकर एक ट्रैक्टर खरीदना चाहता हूँ। ग्राम पंचायतों की स्थापना से भी गाँवों की हालत में बहुत सुधार हुआ है।

               मैं अपने बेटों को खूब पढ़ाकर बड़ा आदमी बनाना चाहता हूँ। मेरी यह इच्छा कब पूरी होगी, कुछ कह नहीं सकता। पर उम्मीद जरूर है।

सप्टेंबर १८, २०२३

अतिवृष्टि एक भीषण समस्या.

 

                               अतिवृष्टि एक भीषण समस्या.  



                  हमारे देश में अतिवृष्टि के कारण प्रतिवर्ष जन-धन की अपार हानि होती है। सरकार को अतिवृष्टि से प्रभावित क्षेत्रों में (5) सरकार की लापरवाही (6) उपसंहार । ]

                 राहत कार्यों पर करोड़ों रुपये व्यय करने पड़ते हैं। प्रगति और विकास कार्य अवरुद्ध हो जाते हैं। इसके बावजूद सरकार ने अतिवृष्टि की इस भीषण समस्या से मुक्ति पाने के लिए आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। 

                 अतिवृष्टि का प्रमुख कारण है, वनों की अंधाधुंध कटाई विश्व भर में मानव ने सघन वनों का सफाया कर दिया है। - औद्योगिक विकास के लिए कारखानों की स्थापना और जनसंख्या की उत्तरोत्तर वृद्धि के कारण भी वनों का ह्रास हुआ। 

                  वनों की कटाई जारी रहने से ऋतुचक्र बदल गया है, जिससे देश में कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि हो रही है। वृक्ष अपनी जड़ों से आसपास के क्षेत्र की मिट्टी को कसकर बाँधे रखते हैं। इससे बरसात के मौसम में आने वाली बाढ़ का वेग कम हो जाता है। इस प्रकार अतिवृष्टि से बचाव में सहायक होने वाले वनों को काटकर मानव ने स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।

                    अतिवृष्टि के कारण नदियों में भयंकर बाढ़ आ जाती है। नदी के किनारे खड़े पेड़ देखते ही देखते मूल सहित उखड़कर नदी के प्रवाह में बहने लगते हैं। नदी रौद्र रूप धारण करती है, तब उसका जल चारों ओर फैलकर तबाही मचाता है। किनारे के गाँवों का नामोनिशान मिट जाता है। खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं। अतिवृष्टि के कारण कच्चे मकान धराशायी होकर पानी में बह जाते हैं। गाँव के अनेक परिवार ऊँचे मंदिरों और स्कूलों में शरण लेने को विवश हो जाते हैं। कुछ लोग पेड़ों पर चढ़कर अपनी जान बचाते हैं। लोगों के अनाज, कपड़े, रुपये पैसे, बरतन, मवेशी वगैरह सभी कुछ अतिवृष्टि से आई बाढ़ में वह जाते हैं।

                   बाँध, सड़कों और पुलों के ध्वस्त हो जाने से राहत कार्यों में बाधा आती हैं। संचार व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाती है। असंख्य पशु-पक्षियों की मृत्यु से चारों और बीभत्स दृश्य उपस्थित होता है। अतिवृष्टि के थम जाने पर जब बाढ़ का पानी उतर जाता हैं, तो चारों तरफ गंदगी ही गंदगी दिखाई देती है। इससे संक्रामक रोगों के फैलने की आशंका बढ़ जाती है। 

                   स्वयंसेवी संस्थाओं व सरकार द्वारा अतिवृष्टि से प्रभावित लोगों को फौरन मदद पहुँचाई जाती है। अतिवृष्टि से प्रतिवर्ष भयंकर तबाही होती है, यह जानते हुए भी सरकार पहले से ही ठोस तैयारी नहीं करती। नदी, नालों एवं गटरों की समय समय पर सफाई नहीं होती ? आखिर इतनी ज्वलंत समस्या के प्रति सरकार उदासीन और मूक द्रष्टा कैसे बनी रहती है? 

                     सरकार को अतिवृष्टि की समस्या का यथाशीघ्र कोई न कोई हल निकालना चाहिए अन्यथा रोंगटे खड़े कर देने वाली यह विनाशलीला हर वर्ष लाखों लोगों पर कहर ढाती रहेगी।

शनिवार, ११ जून, २०२२

जून ११, २०२२

मैं श्यामपट्ट बोल रहा हूँ

               मैं श्यामपट्ट बोल रहा हूँ 







    [ रूपरेखा (1) जन्मदाता (2) इतिहास और रूप-परिवर्तन 3) कालेपन का रहस्य (4) शिक्षक-विद्यार्थियों के रिश्तों का साधन (5) ज्ञान-प्राप्ति और कमरे को कक्षा बनाने का श्रेय 6) शिक्षकों-विद्यार्थियों के प्रति आभारी 7 हार्दिक इच्छा (8) शिकायत और निष्कर्ष।] 

      जो हाँ में श्यामपट्ट बोल रहा हूँ। एक निपुण कारीगर ने मेरा निर्माण किया था। जब मैं बनकर तैयार हुआ उस समय मेरा रूप अत्यंत आकर्षक था। हर शिक्षक मुझ पर लिखने के लिए आतुर रहता था। आखिर वह पुनीत बड़ी आ ही गई जब गणित के एक शिक्षक ने मोतों के से चमकीले अक्षरों में गणित के सूत्र लिखकर मेरा जीवन सार्थक कर दिया। प्रतिदिन सुबह लिखे सुभाषितों ने मेरा गौरव और बढ़ा दिया है। 

        मेरा इतिहास उतना ही पुराना है, जितना गुरु-शिष्य संबंधों का इतिहास समय के परिवर्तन के साथ-साथ मेरा रूप और आकार भी बदलता गया। अब तो मैं रेत, सीमेंट, लकड़ी, प्लास्टिक, टिन तथा कपड़े के रूप में भी उपलब्ध हूँ। शुक्र है कि मेरे नाम के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई। मेरे दो अभिन्न सहयोगी है- बाक और डस्टर

जून ११, २०२२

एक भग्न मंदिर की आत्मकथा

      एक भग्न मंदिर की आत्मकथा





(1) प्रस्तावना (2) भक्तों द्वारा उपासना (4) स्वतंत्रता सेनानियों का आश्रय स्थल 14 वर्तमान स्थिति का कारण (5) स्वतंत्रता-संग्राम में योगदान (6) व्यथित मनोदशा(7) हार्दिक इच्छा

         मैं इस पहाड़ी की उत्तर-पूर्वी सीमा पर स्थित एक भान मंदिर हूँ। मैं कभी दुर्गा माता का एक भव्य मंदिर या मनोकामना पूरी होने पर एक सेठ ने मेरा निर्माण करवाया था। मैं पूरी तरह संगमरमर से बना था। एक प्रसिद्ध शिल्पकार से दुर्गा माता की मूर्ति बनवाई गई थी। सेठ ने उसे यहाँ लाकर शुभ मुहूर्त में स्थापित किया था प्रतिदिन सुबह-शाम माता की आरती होती थी। घंटे-पड़ियालों के स्वर गूंज उठते ।

     मंदिर से उत्तर की तरफ एक तालाब था जिसमें स्नान कर भक्तगण यहाँ देवी जी के दर्शन करने आते थे। नवरात्रि में यहाँ भक्तों को बहुत भीड़ रहती थी। श्रद्धालु और दुःखी-पीडित लोग यहाँ बैठकर दुर्गा-सप्तशती का पाठ करते थे। मैं भी सभी को सुखी देखना चाहता था।

       आजादी की लड़ाई लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानी मेरे पास आकर काफी देर तक बैठते, मत्था टकते और पुद्ध में विजय की कामना करते। चैत्र मास की प्रतिपदा को यहाँ भीषण युद्ध हुआ। आजादी के मतवाले बार स्वतंत्रता सेनानियों ने मेरी ओट लेकर अंग्रेजों को छठी का दूध याद करा दिया। इस युद्ध में अंग्रेजों की हार हुई। किंतु पराजय से बौखलाए अंग्रेजों ने मुझे अपनी हार का कारण मानकर भग्न करवा दिया। परोक्ष रूप से हो सही स्वतंत्रता सेनानियों की सहायता कर स्वाधीनता-यज्ञ में मैंने भी अपनो आहुति दी थी किंतु खेद है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी आज तक किसी ने मेरे पुनर्निमाण का विचार नहीं किया। इतना ही नहीं, बहुतों को तो यह भी नहीं मालूम कि यहाँ कभी कोई मंदिर था। उत्तरी छोर पर स्थित तालाब भी सूख गया है। अब किसान वहाँ खेती करते हैं।

      मेरी भग्न दीवारों पर चढ़कर बच्चे उछल कूद करते हैं। दिन में उनकी किलकारियाँ यहाँ गूंजती रहती है। किंतु रात मे यहाँ बेहट सन्नाटा छा जाता है। कभी-कभी हल चलाकर आप थके किसान मेरो भग्न दीवारों को ओर में बैठकर विश्राम और नाश्ता करते हैं। 

      कभी-कभी सोचता हूँ कि भक्तों की भीड़ से गुलजार रहने वाला यह स्थान क्या कभी आबाद नहीं होगा? क्या मेरी सुधि लेने वाला अब कोई भक्त नहीं रहा? क्या अब हमेशा मुझे इस विवाधान में दो ही अकेलेपन का जीवन जीना पड़ेगा? क्या यह मेरा कर्मफल है ? खुशी की बात है कि सरकार ने इस पहाड़ी को तोड़कर अब यहाँ एक बड़ा अस्पताल बनवाने को घोषणा की है। किंतु सरकारी घोषणाओं का क्या? घोषणा के दो वर्ष बीत जाने के बाद भी अभी तक कुछ नहीं हुआ। 

      चाहे मंदिर के रूप में मेरा नवनिर्माण हो, चाहे मुझे तोडकर अस्पताल बनवा दिया जाए में हर रूप में मानवमात्र के हित से जुड़ा रहना चाहता हूँ।

जून ११, २०२२

एक किसान की आत्मकथा

           एक किसान की आत्मकथा



 [ रूपरेखा (1) धरती का लाल और अनदाता (2) दैनिक जीवन की झलक (3) कठिन जीवन (4) सामाजि जीवन (5) प्रगति के पथ पर ] 

     मैं एक किसान हूँ। खेती मेरा व्यवसाय है। लोग मुझे धरती का लाल कहते हैं। पहले लोग राजा को अन्नदाता' कहते थे। अब स्वतंत्र भारत में यह गौरव हमें दिया जाता है। 

     मैं गाँव में रहता हूँ। मेरा घर पहले कच्चा था। अब इसका कुछ हिस्सा पक्का बन गया है। इसी घर में में अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता हूँ। मैं बहुत सवेरे हल-बैल लेकर अपने खेत पर चला जाता हूँ। पूरे दिन वहाँ रहता हूँ। अपने खेतों की जोताई करता हूँ। उनको बोवाई करता हूँ जब छोटे-छोटे पौधे बड़े हो हैं तो उनकी सिंचाई और निराई करता हूँ। फिर रात-दिन फसल की देखभाल करता रहता हूँ। फसल पक जाने पर उसको कढाई करता हूँ। तब कहीं जाकर अनाज घर में आता है। मेरी पत्नी और बच्चे भी इन कामों में मेरी मदद करते हैं। अनाज के दाने वास्तव में मेरी मेहनत के मोती हैं। 

     सावन भादों की मूसलाधार बरसात में भी में खेतों में काम करता हूँ। पूष -माथ को ठिठुरती सदी में फटे कपड़े लपेटे में फसलों की सिंचाई करता हूँ। जेठ-वैशाख को तपती लू में फसल को मैढ़ाई करता हूँ। इतना करने पर भी कभी-कभी प्रकृति साथ नहीं देती। कभी सूखे के कारण फसल नष्ट हो जाती है और कभी ज्यादा वर्षा और बाढ़ से फसल बरबाद हो जाती है। घर की पूंजी भी मिट्टी में मिल जाती है। फिर भी में अपने काम में जुटा रहता हूँ। 

      त्योहार ही हमारे मनोरंजन के साधन हैं। मेरे परिवार में होली दीवाली दशहरा रक्षाबंधन, जन्माष्टमी रामनवमी आदि त्योहार उत्साह से मनाए जाते हैं। हम गरीब भले ही हों पर अतिथियों एवं साधु-संतों का हमेशा स्वागत करते हैं। उनकी सेवा-सत्कार में कोई कसर नहीं आने देते। हमारा रहन-सहन बहुत सादा है। खेती से जो भी मिल जाता है उसी में हम गुजारा कर लेते हैं। उसी में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई होती है। उसी में से शादी-ब्याह का काम भी निपटा लेते हैं। 

      इन दिनों हम किसानों की दशा में काफी सुधार हुआ है। ग्रामीण बैंक से आज हमें कम सूद पर कर्ज मिल जाता है। इससे साहूकारों के चंगुल से हमें छुटकारा मिल गया है। मैं भी बैंक से कर्ज लेकर एक ट्रैक्टर खरोदना चाहता हूँ। ग्राम पंचायतों को स्थापना से भी गाँवों की हालत में बहुत सुधार हुआ है। 

       मैं अपने बेटों को खूब पढ़ाकर बड़ा आदमी बनाना चाहता हूँ। मेरी यह इच्छा कब पूरी होगी, कुछ कह नहीं सकता। पर उम्मीद जरूर है।

जून ११, २०२२

एक भिखारी की आत्मकथा

           एक भिखारी की आत्मकथा



[ रूपरेखा (1) दिल की बात बताने का मौका (2) जन्म बचपन और भिखारी बनाने वाली घटना (3) दुखी जीवन की झलक (4) दुर्दशा से ऊबना (5) मृत्यु की प्रतीक्षा ]

        मैं एक भिखारी हूँ। मेरी जिंदगी अपमान और तिरस्कार से भरी हुई है। आज पहली बार आपने मुझसे इतनी हमदर्दी जताई है। 

     मेरा जन्म बिहार के एक गाँव में हुआ था। मेरे पिता गरीब किसान थे। उनके पास बहुत कम जमीन थी। मैं अपने माता-पिता की इकलौती संतान था। इसलिए गरीबी के बावजूद मेरा बचपन लाड़ प्यार में बीता। एक बार हमारे प्रदेश में भयंकर अकाल पड़ा। दो-तीन साल तक बरसात नहीं हुई। लोग दाने-दाने को तरसने लगे। इसी बीच मेरी माँ बीमार पड़ गई। पिता जी पर कर्ज का बोझ बढ़ता गया। कर्ज चुकाने में हमारे खेत बिक गए। मेरे पास कुछ नहीं रहा। कुछ दिनों बाद मेरी माँ चल बसी समय में पिता जी की भी मृत्यु हो गई। 

       इस दुनिया में अब मेरा कोई सहारा न रहा। रोजी रोटी की तलाश में मैं दर-दर भटकता रहा। एक दिन गाड़ी में बैठकर किसी तरह इस महानगर में पहुँचा। यहाँ नौकरी के लिए मैंने बहुत कोशिश की पर नौकरी नहीं मिली। इसी दौरान एक सड़क दुर्घटना में मेरा दाहिना पाँव कट गया। अब तो भीख माँगने के सिवा मेरे पास कोई चारा हो न रहा। मैं सड़क के एक नुक्कड़ पर बैठकर भीख माँगने लगा। क्या करता? पेट की आग तो बुझानी ही थी। 

       मुझे भीख माँगते माँगते कई साल गुजर चुके हैं। भीख माँगने में दुख होता है। पर क्या करूँ भिखमंगे के जीवन में सुख और सम्मान कहाँ? लोग मेरी छाया से भी दूर भागते हैं। मैं दिन भर भीख माँगता हुआ भटकता रहता हूँ। जो भी सामने आ जाता है. उसी के सामने हाथ फैला देता हूँ। भीख में मिले फटे पुराने कपड़े हो मेरी पोशाक है। फुटपाथ ही मेरा बिछोना है। आकाश ही मेरा ओढना है। बरसात और जाड़े में मेरी हालत बहुत बुरी हो जाती है। बस किसी तरह मरते-मरते जा रहा हूँ। 

      अब तो इस दुर्दशा से दिल ऊब गया है। लोग भिखारियों को भीख न माँगने का उपदेश देते हैं पर इस दुर्दशा से उन्हें छुटकारा दिलाने की बात कोई नहीं सोचता। अब तो मीत हो इस नरक जैसे जीवन से मुझे छुटकारा दिलाएगी उसी का इंतजार कर रहा हूँ। 

      बाबू जी आपको हमदर्दी जताने के लिए धन्यवाद !॥

जून ११, २०२२

भूकंप-पीड़ित की आत्मकथा

           भूकंप-पीड़ित की आत्मकथा


 

[ रूपरेखा (1) दर्द भरी याद (2) सुखी जीवन (3) यह भयानक सुबह (4) सब कुछ नष्ट (5) अंत]

       अकसर लोग छोटे-छोटे दुखों का रोना रोते हैं। जरा-सी तकलीफ पढ़ते ही लोग हिम्मत हार जाते हैं। लेकिन हमने जो विपत्ति भोगी है, शायद ही किसी ने भोगी हो। 30 सितंबर, 1993 की वह रात भुलाए नहीं भूलती। इस रात को हमारे इलाके में भयानक भूकंप आया था। देखते ही देखते हजारों लोगों की जानें चली गई। कई मकान ढह गए. भारी संख्या में लोग बेघर हो गए। जो शाम को अच्छे-खासे खाते-पीते थे, रातभर में सब कुछ गंवा बैठे।

       मेरा घर महाराष्ट्र के लातूर जिले के किल्लारी गाँव में है। मेरा परिवार छोटा पर सुखी या मेरी पत्नी लक्ष्मी के समान थी। फूल जैसे दो बच्चे थे। पंद्रह वर्ष का राजू और बारह वर्ष की शुभांगी कितने होनहार थे दोनों खेती भी गुजर-बसर के लिए काफी थी। एक दुधारू भैंस थी। खूब दूध देती थी। महीने भर में काफी थी इकट्ठा हो जाता था। इससे मुझे अच्छी आय हो जाती थी। गाँव के लोग मेरा आदर करते थे। 

      29 सितंबर को गणेश विसर्जन था। दिन भर के थके हुए लोग रात को चैन की नींद सो रहे थे। तभी आधी रात के समय धरतो हिल उठी सारे गाँव में कोहराम मच गया। गाँव के सभी मकान गिर गए। चारों ओर उसका मलबा फैल गया। इसके बाद क्या हुआ मुझे नहीं मालूम ।

    आँख खुली तो मैंने अपने को शिबिर में पाया। लोगों ने बताया कि मुझे बेहोशी की हालत में मलबे से निकाला गया था। मेरा पूरा परिवार भूकंप का शिकार बन गया था। यह आपदा तो पूरे गाँव पर आई थी कौन किसको हिम्मत बँधाता समूचा गाँव श्मशान भूमि बन गया था। 

      लेकिन सरकार ने तुरंत राहत कार्य शुरू कर दिया। सरकारी कर्मचारी खाने का सामान और दवाइयाँ लेकर पहुँच गए। देश के हर भाग से शिबिरों में सहायता पहुँचने लगी। लोग हमारे दुख में हाथ बँटा रहे थे। अब हम असहाय नहीं थे। सारा देश हमारी मदद कर रहा था। 

      आज मेरा गाँव नए सिरे से बस गया है। गाँव के लोगों को छोटे-छोटे मकान मिल गए हैं। ये बहुत सुविधाजनक हैं। अब लोग फिर से अपनी गृहस्थी जमाने में लग गए हैं। यह देशवासियों की सहानुभूति के कारण ही संभव हुआ है। 

      मुझे भी रहने के लिए मकान मिल गया है। पेट भरने के लिए अनाज भी मेरे पास है। पर मेरा परिवार मुझसे सदा के लिए बिछुड़ गया है। वह मुझे अब कभी नहीं मिल पाएगा।

जून ११, २०२२

घायल सैनिक की आत्मकथा

          घायल सैनिक की आत्मकथा



 [रूपरेखा (1) अपने बारे में बताने की इच्छा (2) सैनिक के रूप में प्रशिक्षण (3) युद्ध के अनुभव (4) जीवन की झलक (5) पिछले युध्द में घायल (6) गाँव की सेवा।] 

       मैं भारतीय सेना का एक भूतपूर्व सैनिक है। कई युद्धों में भाग लिया है। यदि तुम मेरे बारे में कुछ जानना चाहते हो, तो सुनो। मेरा जन्म महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव में हुआ था। मेरे पिता जी और मेरे चाचा जी भी सेना में ही थे। वे चाहते थे कि मैं भी सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करूँ। अत: पढ़ाई पूरी कर मैं नाशिक के भोसला मिलिट्री स्कूल में भर्ती हो गया। यहाँ मुझे हर में तरह की सैनिक शिक्षा दी गई। मुझे बंदूक, मशीनगन, सीप और टैंक चलाना सिखाया गया। बाद में मुझे थल सेना में शामिल कर लिया गया।            सन 1962 में चीन ने हमारे देश पर हमला किया था। उस समय हमारी टुकड़ी को लद्दाख के मोर्चे पर भेजा गया था। तब मैंने जान की बाजी लगाकर भारतीय चौकियों की रक्षा की थी। मैंने अनेक चीनी सैनिकों को मार गिराया था। लड़ाई खत्म होने पर इस वीरता के लिए मेरा सम्मान किया गया था। इसके साथ ही मेरी तरक्की भी हुई और मैं बड़ा अधिकारी बन गया।

       सेना में रहते हुए हर साल मैं छुट्टी लेकर कुछ दिनों के लिए अपने गाँव आता था। माँ की ममता और बच्चों का स्नेह पाकर मैं खुशी से फूला नहीं समाता था। मैं अपने दोनों बेटों को लड़ाई के किस्से सुनाता था। छु‌ट्टियाँ खत्म होने पर फिर अपनी से ड्यूटी पर लौट जाता था।

        1965 में पाकिस्तान के साथ जो युद्ध हुआ था, उसमें भी मुझे सीमा पर भेजा गया था। वहाँ मैंने पाकिस्तान के कई टैंक नष्ट कर दिए थे। दुश्मन के कई सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। इस युद्ध में में बुरी तरह घायल हो गया था। मुझे कई महीने अस्पताल में रहना पड़ा था। सरकार ने इस अद्भुत वीरता के लिए मुझे वीरचक्र' प्रदान किया था। 

        अब तो मैं अपने गाँव में रहता हूँ। गाँव की छोटी मोटी सेवा करता हूँ। यहाँ के लोग मेरा बहुत आदर करते हैं।

जून ११, २०२२

हमारे स्कूल का वार्षिकोत्सव

        हमारे स्कूल का वार्षिकोत्सव



 [ रूपरेखा (1) प्रतिवर्ष होने वाला उत्सव (2) समय और तैयारी (3) खेल-कूद के कार्यक्रम (4) प्रदर्शनी का उ‌द्घाटन व प्रतियोगिताएँ 5) अंतिम दिन नाटक, वार्षिक रिपोर्ट, पुरस्कार वितरण (6) उपसंहार ।] 

       हमारे स्कूल में हर साल वार्षिकोत्सव मनाया जाता है। इसका आयोजन प्रायः जनवरी के पहले सप्ताह में होता है। इसकी तैयारियाँ दिसंबर के प्रारंभ से ही शुरू हो जाती हैं। 

     इस साल 4 से 6 जनवरी तक हमारे स्कूल का वार्षिकोत्सव धूमधाम से मनाया गया। स्कूल की बिल्डिंग को बिजली के रंगबिगि लट्टुओं से सजाया गया था। 

   ।।।खेल-कूद के शानदार कार्यक्रम से वार्षिकोत्सव का आरंभ हुआ। सबसे पहले छोटे बच्चों की प्रतियोगिताएँ हुई। बाद में बड़े बच्चों की प्रतियोगिताएँ शुरू हुई। इसमें सौ और दो सौ मीटर की दौड़ से प्रतियोगिता की शुरुआत हुई। ऊंची कूद, लंबी कूद और गोला फेंकने की प्रतियोगिताएँ भी बहुत रोचक रहीं। रस्साकशी की प्रतियोगिता में अध्यापकों ने भी भाग लिया। इस प्रतियोगिता में विद्यार्थियों की जीत हुई। मुझे इन प्रतियोगिताओं में कुछ इनाम भी मिले। 

       दूसरे दिन हमारे शहर के महापौर ने स्कूल में आयोजित प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। प्रदर्शनी में विज्ञान, भूगोल, गणित, इतिहास आदि विषयों को प्रमुखता दी गई थी। प्रदर्शनी में विद्यार्थियों द्वारा बनाए गए मॉडल, चार्ट, चित्र और विभिन्न कलाकृतियों के नमूने रखे गए थे। शाम को कविता पाठ, भाषण प्रतियोगिता तथा अंत्याक्षरी आदि कार्यक्रम रखे गए थे। सभी कार्यक्रमों में विद्यार्थियों ने बहुत उत्साह से भाग लिया।

       तीसरे और अंतिम दिन विद्यार्थियों ने 'सम्राट अशोक' नामक नाटिका प्रस्तुत की। सम्राट अशोक का अभिनय करने वाले कलाकार ने दर्शकों पर अच्छा प्रभाव डाला। इसके बाद स्कूल की वार्षिक रिपोर्ट पढ़ी गई। महात्मा गांधी कालेज के प्राचार्य जोशी जी के हाथों विजेताओं को पुरस्कार दिए गए। उन्होंने विद्यार्थियों को अध्ययन, अनुशासन और देश-प्रेम का महत्त्व समझाया। अंत में आभार-प्रदर्शन और जलपान के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

     सचमुच, इस साल के वार्षिकोत्सव ने हमारे विद्यालय की प्रतिष्ठा में चार चाँद लगा दिए।

जून ११, २०२२

मेरी प्रिय ऋतु

                    मेरी प्रिय ऋतु 



[ रूपरेखा (1) प्रिय ऋतु का उल्लेख (2) प्रिय ऋतु की प्राकृतिक शोभा (3) लोगों पर असर (4) मेरा लगाय (5) मनपसंद ऋतु की प्रतीक्षा] 

      भारत प्रकृति का दुलारा देश है। यहाँ वर्ष भर में छः ऋतुएँ आती है वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर ये आएँ इसी क्रम में आती हैं। इनमें से हर ऋतु का अपना महत्त्व है, अपनी विशेषता है। इनमें वसंत ऋतु मेरी सबसे प्रिय ऋतु है। 

      शिशिर ऋतु का अंत होते ही शीतकाल विदा होने लगता है। मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आदि सभी जाड़े की हिंदून में छुटकारा पाते हैं। फिर धरती पर ऋतुराज वसंत की सवारी सज-धज कर आ पहुँचती है। वसंत ऋतु का आगमन होते हो प्रकृति रंगबिरंगे फूलों से धरती को सजा देती है। सारा वातावरण खुशबू से महक उठता है। अमराइयों में आम के सुगंधित बौर अपनी सुगंध बिखेरने लगते हैं। पेड़ पौधे और लताएँ नया जीवन पाकर झूम उठते हैं और ऋतुराज वसंत के गुणगान करते हुए गुनगुनाने लगते हैं। रंगबिरंगी तितलियाँ बगीचों की शोभा में चार चाँद लगा देती हैं। कोयल के ' कुछ-कुछ' के स्वर वातावरण को संगीतमय बना देते हैं। 

      ऋतुराज वसंत जन जन के मन में नई उमंगें भर देता है। प्रकृति को मस्ती का लोगों पर बहुत असर पड़ता है। लोग ढोलक, करताल और मंजीरों के साथ झूम-झूमकर फाग गाते और वसंत पंचमी का त्योहार मनाते हैं। वह लोकगीत मन में उमंग भर देता है। फाग सुनना मुझे बहुत अच्छा लगता है। रंगों के त्योहार होली की तो बात ही निराली है। यह त्योहार वसंत के उल्लास में चार चाँद लगा देता है। 

     वसंत ऋतु में मैं सुबह-सुबह घूमने जाता हूँ। मेरे घर से कुछ दूरी पर एक हराभरा और खूबसूरत बगाँचा है। हरी हरी घास और रंगबिरंगे फूलों से भरे हुए इस बगीचे को सुंदरता मेरा मन मोह लेती है। 

       वसंत ऋतु बहुत ही मनभावन ऋतु है। इसीलिए यह मेरी प्रिय ऋतु है। मैं इसके आगमन की सदा प्रतीक्षा करता रहता हूँ।

जून ११, २०२२

मेरी प्रिय पुस्तक

                   मेरी प्रिय पुस्तक 



[ रूपरेखा : (1) प्रिय पुस्तक का उल्लेख (2) पुस्तक की विषयवस्तु (3) पुस्तक की विशेषता (4) पुस्तक का प्रभाव (5) महत्त्व ।] 

        पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ मुझे अन्य पुस्तकें पढ़ने का भी बहुत शौक है। मैं अपने विद्यालय के पुस्तकालय से कई अच्छी पुस्तकें लाकर पढ़ चुका हूँ। इनमें से मुझे गांधी जी की आत्मकथा सबसे अधिक प्रिय है। इस पुस्तक का नाम है 'सत्य के प्रयोग'। मुझ पर इस पुस्तक का गहरा प्रभाव है। 

       गांधी जी ने यह पुस्तक अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखी है। इसका नाम है 'सत्य ना प्रयोगो'। हिंदी, मराठी और अँग्रेजी में भी इसका अनुवाद हुआ है। हिंदी में इसका नाम 'सत्य के प्रयोग', मराठी में 'सत्याचे प्रयोग' तथा अंग्रेजी में ‘एक्स्पेरिमेंट आफ ट्रुथ' है। भारत की अन्य भाषाओं में भी इसके अनुवाद हुए हैं। गांधी जी अपने जीवन में सत्य को सबसे अधिक महत्त्व देते थे। इसीलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा को यही नाम दिया। 

       'सत्य के प्रयोग' में गांधी जी ने अपनी कमियों एवं बुराइयों का खुलकर वर्णन किया है। उन्होंने अपने धूम्रपान, मांसाहार व चोरी करने आदि के बारे में कुछ भी नहीं छिपाया है। हर जगह उन्होंने अपनी गलतियों को स्वीकार किया है। उन्होंने यह बताया है कि किस प्रकार वे इन बुराइयों के चक्कर में फँसे और कैसे उन्होंने इनसे छुटकारा पाया। इसके अलावा गांधी जी ने अपनी शिक्षा, विलायत-यात्रा, वकालत, दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह तथा भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों की इस पुस्तक में विस्तृत चर्चा की है। 

         गांधी जी के ये संस्मरण हमें सदा प्रेरणा देते रहते हैं। इनसे हमें सीख मिलती है कि एक साधारण व्यक्ति किस तरह इतना महान बन गया। गांधी जी अपनी सच्चाई, लगन, अ . ईमानदारी और आत्मशक्ति से हमारे देश के महान नेता और युग-पुरुष बन गए। इन्हीं गुणों के कारण आज हम उन्हें 'राष्ट्रपिता' के रूप में याद करते हैं। 

         इस पुस्तक की भाषा बहुत सरल और हृदय को छू लेने वाली है। इसकी शैली भी बहुत रोचक है। इस पुस्तक को पढ़ने से पाठक के हृदय में सत्य, अहिंसा, प्रेम, आत्मविश्वास तथा मानव-सेवा के भाव जागृत हो जाते हैं। 

        गांधी जी की आत्मकथा पढ़ने से मुझे बहुत लाभ हुआ है। इसके प्रभाव से मैंने कई बुरी आदतों से छुटकारा पाया है। 

       मेरी तरह कई लोगों ने गांधी जी की आत्मकथा पढ़कर अपने जीवन की राह बदल डाली है। हमारे देश में समाजसुधार, दलितोद्धार तथा शोषण के खिलाफ आवाज उठाने में यह पुस्तक काफी सहायक सिद्ध हुई है। अब तो यह पुस्तक मेरी मित्र, गुरु और मार्गदर्शक बन गई है। जिस तरह गांधी जी मेरे प्रिय नेता हैं, उसी तरह उनकी यह आत्मकथा मेरी प्रिय पुस्तक है। मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक भारतीय गांधी जी की आत्मकथा अवश्य पढ़े।