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पहिली ते दहावी संपूर्ण अभ्यास

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गुरुवार, ५ ऑक्टोबर, २०२३

यदि समाचारपत्र न होते.....

              यदि समाचारपत्र न होते....

 [ रूपरेखा (1) प्रस्तावना (2) विभिन्न जानकारियों का अभाव (3) विज्ञापन के सशक्त माध्यम से वंचित (4) सरकारी नीतियों की जानकारी न मिलती (5) कृषि संबंधी नवीनतम जानकारी का अभाव (6) राष्ट्र निर्माण में सहायक समाचारों से वंचित (7) निष्कर्ष 1] 

   भव बआकाशवाणी और दूरदर्शन से जो समाचार हमें प्राप्त होते हैं, वे अपर्याप्त होते हैं। समाचारपत्र हमारे लिए सुबह की चाय को तरह ही जरूरी है। समाचारपत्रों के माध्यम से हम स्वयं को देश और संसार से जुड़ा हुआ पाते हैं। यदि समाचारपत्र न होते तो देश-दुनिया के राजनीतिक, आर्थिक, व्यापारिक, सांस्कृतिक और सामरिक समाचारों तथा विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं के बारे में कोई जानकारी न मिलने से हम बेचैन हो जाते। 

       हम अपनी रुचि और विचारधारा के अनुसार अपना मनपसंद समाचारपत्र खरीदते हैं। समाचारपत्रों से हमें कई प्रकार को जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। यदि समाचारपत्र न होते तो हम विविध प्रकार की जानकारियों तथा अन्य पठनीय सामग्रियों से वंचित रह जाते।

       प्रचार और विज्ञापन के इस युग में समाचारपत्रों को विशिष्ट भूमिका है। समाचारपत्र विज्ञापन के सशक्त माध्यम है। फिल्म व्यापार नौकरी, जगह-जमीन विभिन्न उत्पादनों तथा समारोहों की जानकारी हमें समाचारपत्रों में प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों से ही मिलती है। व्यापार वृद्धि में समाचारपत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी शक्ति और उनका प्रभाव चारों और व्याप्त है। समाचारपत्रों के महत्व का वर्णन करते हुए उर्दू के कवि अकबर इलाहाबादी ने कहा है 'खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।' यदि समाचारपत्र न होते. तो जनजीवन को प्रभावित करने वाला एक अत्यधिक सशक्त माध्यम हो न रहता। 

        यदि समाचारपत्र न होते, तो जनता को सरकारी नीतियों की जानकारी न मिल पाती। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा व्यापारिक तथा औद्योगिक क्षेत्रों को गतिविधियों की जानकारी से वंचित रह जाता। लोगों को कृषि विकास संबंधी गतिविधियों का भी यथोचित ज्ञान नहीं हो पाता। देश की प्रगति अत्यंत मंद पड़ जाती ।

      भारत के स्वतंत्रता संग्राम में समाचारपत्रों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी आज भी राष्ट्र के पुनर्निर्माण में समाचारपत्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। समाचारपत्र को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यदि समाचारपत्र न होते. तो लोकतंत्र के इस महत्त्वपूर्ण स्तंभ से हम वंचित रह जाते। 

       यदि समाचारपत्र न होते तो हमारे जीवन के विविध क्षेत्रों की गतिविधियों आज जैसी तेज न होतीं। हम यह सोच भी नहीं सकते कि समाचारपत्रों का अस्तित्व न होता तो क्या होता।

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