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पहिली ते दहावी संपूर्ण अभ्यास

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सोमवार, १८ सप्टेंबर, २०२३

अतिवृष्टि एक भीषण समस्या.

 

                               अतिवृष्टि एक भीषण समस्या.  



                  हमारे देश में अतिवृष्टि के कारण प्रतिवर्ष जन-धन की अपार हानि होती है। सरकार को अतिवृष्टि से प्रभावित क्षेत्रों में (5) सरकार की लापरवाही (6) उपसंहार । ]

                 राहत कार्यों पर करोड़ों रुपये व्यय करने पड़ते हैं। प्रगति और विकास कार्य अवरुद्ध हो जाते हैं। इसके बावजूद सरकार ने अतिवृष्टि की इस भीषण समस्या से मुक्ति पाने के लिए आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। 

                 अतिवृष्टि का प्रमुख कारण है, वनों की अंधाधुंध कटाई विश्व भर में मानव ने सघन वनों का सफाया कर दिया है। - औद्योगिक विकास के लिए कारखानों की स्थापना और जनसंख्या की उत्तरोत्तर वृद्धि के कारण भी वनों का ह्रास हुआ। 

                  वनों की कटाई जारी रहने से ऋतुचक्र बदल गया है, जिससे देश में कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि हो रही है। वृक्ष अपनी जड़ों से आसपास के क्षेत्र की मिट्टी को कसकर बाँधे रखते हैं। इससे बरसात के मौसम में आने वाली बाढ़ का वेग कम हो जाता है। इस प्रकार अतिवृष्टि से बचाव में सहायक होने वाले वनों को काटकर मानव ने स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।

                    अतिवृष्टि के कारण नदियों में भयंकर बाढ़ आ जाती है। नदी के किनारे खड़े पेड़ देखते ही देखते मूल सहित उखड़कर नदी के प्रवाह में बहने लगते हैं। नदी रौद्र रूप धारण करती है, तब उसका जल चारों ओर फैलकर तबाही मचाता है। किनारे के गाँवों का नामोनिशान मिट जाता है। खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं। अतिवृष्टि के कारण कच्चे मकान धराशायी होकर पानी में बह जाते हैं। गाँव के अनेक परिवार ऊँचे मंदिरों और स्कूलों में शरण लेने को विवश हो जाते हैं। कुछ लोग पेड़ों पर चढ़कर अपनी जान बचाते हैं। लोगों के अनाज, कपड़े, रुपये पैसे, बरतन, मवेशी वगैरह सभी कुछ अतिवृष्टि से आई बाढ़ में वह जाते हैं।

                   बाँध, सड़कों और पुलों के ध्वस्त हो जाने से राहत कार्यों में बाधा आती हैं। संचार व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाती है। असंख्य पशु-पक्षियों की मृत्यु से चारों और बीभत्स दृश्य उपस्थित होता है। अतिवृष्टि के थम जाने पर जब बाढ़ का पानी उतर जाता हैं, तो चारों तरफ गंदगी ही गंदगी दिखाई देती है। इससे संक्रामक रोगों के फैलने की आशंका बढ़ जाती है। 

                   स्वयंसेवी संस्थाओं व सरकार द्वारा अतिवृष्टि से प्रभावित लोगों को फौरन मदद पहुँचाई जाती है। अतिवृष्टि से प्रतिवर्ष भयंकर तबाही होती है, यह जानते हुए भी सरकार पहले से ही ठोस तैयारी नहीं करती। नदी, नालों एवं गटरों की समय समय पर सफाई नहीं होती ? आखिर इतनी ज्वलंत समस्या के प्रति सरकार उदासीन और मूक द्रष्टा कैसे बनी रहती है? 

                     सरकार को अतिवृष्टि की समस्या का यथाशीघ्र कोई न कोई हल निकालना चाहिए अन्यथा रोंगटे खड़े कर देने वाली यह विनाशलीला हर वर्ष लाखों लोगों पर कहर ढाती रहेगी।

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