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सोमवार, १८ सप्टेंबर, २०२३

घायल सैनिक की आत्मकथा

 

                              घायल सैनिक की आत्मकथा



 [ रूपरेखा : (1) अपने बारे में बताने की इच्छा (2) सैनिक के रूप में प्रशिक्षण (3) बुद्ध के अनुभव (4) जीवन की झलक (5) पिछले युद्ध में घायल (6) गाँव की सेवा।]

                    मैं भारतीय सेना का एक भूतपूर्व सैनिक हैं। मैंने कई युद्धों में भाग लिया है। यदि तुम मेरे बारे में कुछ जानता चाहते हो, तो सुनो। 

                  मेरा जन्म महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव में हुआ था। मेरे पिता जी और मेरे चाचा जी भी सेना में ही थे। वे चाहते थे कि मैं भी सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करूँ। अतः पढ़ाई पूरी कर मैं नाशिक के भोसला मिलिट्री स्कूल में भर्ती हो गया। वहाँ मुझे हर तरह की सैनिक शिक्षा दी गई। मुझे बंदूक, मशीनगन, तोप और टैंक चलाना सिखाया गया। बाद में मुझे थल सेना में शामिल कर लिया गया। 

                   सन 1962 में चीन ने हमारे देश पर हमला किया था। उस समय हमारी टुकड़ी को लद्दाख के मोर्चे पर भेजा गया था। तब मैंने जान की बाजी लगाकर भारतीय चौकियों की रक्षा की थी। मैंने अनेक चीनी सैनिकों को मार गिराया था। लड़ाई खत्म होने पर इस वीरता के लिए मेरा सम्मान किया गया था। इसके साथ ही मेरी तरक्की भी हुई और मैं बड़ा अधिकारी बन गया.       

                सेना में रहते हुए हर साल में छुट्टी लेकर कुछ दिनों के लिए अपने गाँव आता था। माँ की ममता और बच्चों का स्नेह पाकर मैं खुशी से फूला नहीं समाता था। मैं अपने दोनों बेटों को लड़ाई के किस्से सुनाता था। छुट्टियाँ खत्म होने पर फिर अपनी ड्यूटी पर लौट जाता था। 

                 1965 में पाकिस्तान के साथ जो युद्ध हुआ था, उसमें भी मुझे सीमा पर भेजा गया था। वहाँ मैंने पाकिस्तान के कई टैंक नष्ट कर दिए थे। दुश्मन के कई सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। इस युद्ध में मैं बुरी तरह घायल हो गया था। मुझे कई महीने अस्पताल में रहना पड़ा था। सरकार ने इस अद्भुत वीरता के लिए मुझे 'वीरचक्र' प्रदान किया था। अब तो मैं अपने गाँव में रहता हूँ। गाँव की छोटी-मोटी सेवा करता हूँ। यहाँ के लोग मेरा बहुत आदर करते हैं।

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