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पहिली ते दहावी संपूर्ण अभ्यास

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सोमवार, १८ सप्टेंबर, २०२३

मैं रुपया बोलता हूँ

 मैं रुपया बोलता हूँ 



[ रूपरेखा (1) प्रस्तावना (2) अनंत शक्ति (3) रुपया और संबंध (4) उपकार (5) farer पर जादू नहीं (6) उपसंहार । ] 

               जी हाँ मैं रुपया बोल रहा हूँ। जब सभ्यता इतनी विकसित नहीं थी, तो लोग वस्तुओं का विनिमय करते थे। फिर उन्होंने मेरी आवश्यकता अनुभव को और मुझे जन्म दिया। मेरे माध्यम से चीजों का क्रय-विक्रय करना सरल हो गया। मुद्रा और सिक्का मेरे ही नाम हैं। मेरा एक कागजी रूप भी है। 

              मेरी शक्ति असीम और अनंत है। मैं पलक झपकते ही राजा को रंक और रंक को राजा बना देता हूँ। पौंड डालर, दीनार, कबल, येन और फ्रैंक के रूप में सारी दुनिया में मेरा ही डंका बज रहा है। मेरी खनक ईमानदार को बेईमान और इनसान को हैवान बना देती है। जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उस पर धन की बरसात होने लगती है। 

                मेरी वजह से रिश्ते बनते भी हैं और बिगड़ते भी है। जिसके पास में रहता हूँ, उससे सभी संबंध जोड़ने लगते हैं और जिसे मैं छोड़ देता है, उसे सब छोड़ देते हैं। मेरे कारण पितृभक्त पितृद्रोही, भाई दुश्मन और मित्र शत्रु बन जाता है। मेरी प्राप्ति इनसान को उन्मत्त बना देती है। 

              सोना भी मेरा ही एक रूप है। मेरा चकाचौंध से पागल होकर इनसान अपने ही रिश्ते का खून कर बैठता है। बड़े-बड़े राजा-महाराजा, बादशाह और सम्राट तक मेरे प्रभाव से अछूते नहीं बचे। कइयों ने मेरे लिए अपने पिता और भाइयों को कारागार में डाल दिया या उनकी हत्या कर दी। विवादों, उपद्रवों और बड़ी बड़ी लड़ाइयों का मुख्य कारण भी मैं हो हैं। 

                मैं लोगों पर उपकार भी करता हूँ। दीन-हीन गरीब और बेसहारा लोगों का में सहारा हूँ। संसार में दान की महिमा को मैंने ही प्रतिष्ठा दिलवाई। जरूरतमंदों को मेरा दान देकर लोग 'दानवीर' कहलाए। मेरे द्वारा ही विद्यालयों, अस्पतालों व धर्मशालाओं का निर्माण होता है। 

                  विरक्त साधु संन्यासियों पर मेरा जादू नहीं चलता। न मेरी खनक उन्हें रिक्षा पाती है और न मेरो चमक उन्हें आकर्षित कर पाती है। 

                  औरघुनाथ से जिसको अचल भक्ति हो, वहाँ मेरा वश चले भी तो कैसे ? फिर भी मैं निवेदन करता हूँ कि आप मेरी साधना करें, उपासना करें। फिर पाएँगे कि संसार का सारा सुख, सारा आनंद आपके कदमों में है।

 

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