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पहिली ते दहावी संपूर्ण अभ्यास

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रविवार, २९ मे, २०२२

भारतीय स्त्रियों की स्थिति तब और अब

  भारतीय स्त्रियों की स्थिति तब और अब



 [ रूपरेखा (1) पुरुषप्रधान समाज (2) स्त्रियों की इच्छाओं का कोई महत्त्व नहीं (3) वर्तमान में आया बदलाव (4) राजनीतिक क्षेत्र में पीछे नहीं (5) जमीन-आसमान का अंतर।] 

        आज से साठ-सत्तर वर्ष पहले भारतीय समाज पूरी तरह पुरुषप्रधान था। परिवार में पुरुष की इच्छा के अनुसार सबकुछ होता था। परिवार के मुखिया का आदेश सबको पालन करना पड़ता था। स्त्रियों को पुरुषों की अवहेलना झेलनी पड़ती थी। 

        हमारे देश की स्त्रियाँ शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़ी हुई थीं। उनका जीवन घर की जिम्मेदारियाँ निभाने में ही बीत जाता था। पिंजरे के पक्षी की तरह उनकी कोई बाहरी जिंदगी नहीं थी। लोग लड़कियों को स्कूल नहीं भेजते थे। यदि भेजते भी थे तो पाँचवीं-छठी कक्षा के बाद उनकी पढ़ाई बंद हो जाती थी। रसोई, कढ़ाई, बुनाई में प्रयोणता ही लड़कियों के लिए पर्याप्त मानी जाती थी। लड़कियों की शादी बुजुर्ग हो तय करते थे। 

        परंतु आज शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण स्त्रियों की स्थिति में बहुत बदलाव आ गया है। आज भारतीय स्त्रियाँ हर मामले में अपनी पसंद को महत्त्व देती हैं। वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। वे लगभग प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों को बराबरी कर रही हैं। वे कॉलेजों में प्रोफेसर और प्रिंसिपल हैं। वे न्यायालयों में वकील हैं और जज हैं। वे जल-थल और वायु सेना में भी काम कर रही है। क्रिकेट, फुटबाल, टेनिस जैसे खेलों में भी महिलाओं की टीमें धूम मचा रही हैं। 

        राजनीति के क्षेत्र में भी स्त्रियों पुरुषों से पीछे नहीं हैं। वे विधानसभाओं और लोकसभा तथा राज्यसभा की सदस्या है। ये मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल है। श्रीमती प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति के पद को सुशोभित कर चुकी हैं। विदेशों में भी भारतीय नारियाँ ऊँचे पदों पर आसीन है।       

       इस प्रकार स्वतंत्रता के बाद भारतीय नारी पिंजरे से निकलकर खुले आकाश को सैर कर रही है। उसकी तब को और अब की स्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है।

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